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पुनर्मूल्यांकन खाते तथा वसूली खाते में अन्तर ( Difference between Revaluation A / c and Realization A / c )

पुनर्मूल्यांकन खाते तथा वसूली खाते में अन्तर ( Difference between Revaluation A / c and Realization A / c )  अन्तर का आधार  1 . समय  2 . उद्देश्य 3 . अंतिम परिणाम  4 . पद्धति  5 . संगठन पर प्रभाव  6 . खातों पर प्रभाव पुनर्मूल्यांकन खाता  नये साझेदार के प्रवेश अथवा पुराने साझेदार की निवृत्ति पर बनाया  जाता है ।  सम्पत्तियों एवं दायित्वों के पुनर्मूल्यांकन हेतु बनाया जाता है । पुनर्मूल्यांकन से लाभ अथवा हानि प्रदर्शित होती है ।  सम्पत्तियों एवं दायित्वों के मूल्य में वृद्धि या कमी की राशि से बनाया जाता है ।   एक साझेदार के प्रवेश अथवा निवृत्ति के कारण केवल संगठन में ही परि वर्तन होता है और फर्म विद्यमान रहती है ।  सम्पत्तियों और दायित्वों के खाते पुनर्मूल्यांकन के कारण परिवर्तित शेष से खुले रहते हैं । वसूली खाता  यह खाता फर्म के विघटन पर बनाया जाता है ।  सम्पत्तियों की वसूली एवं दायित्वों के भुगतान के लिए बनाया जाता है । यह खाता वसूली पर लाभ अथवा हानि को इंगित करता है ।  इस खाते में सम्पत्तियों एवं दायित्वों क...
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विघटन पर खोले जाने वाले खाते ( Accounts being opened at the time of Dissolution )

विघटन पर खोले जाने वाले खाते ( Accounts being opened at the time of Dissolution )   साझेदारी के विघटन पर निम्नलिखित खाते खोले जाते हैं -  वसूली खाता ( Realization Account ) – साझेदारी के विघटन पर फर्म की सम्पत्तियों एवं दायित्वों के खाते बन्द करने हेतु साथ ही सम्पत्तियों के विक्रय से प्राप्त राशि तथा दायित्वों के भुगतान का लेखा करने के लिए बनाये गए खाते को ही वसूली खाता या रोकीकरण खाता कहते हैं । यह एक अवास्तविक खाता है , जिसका शेष विघटन पर लाभ या हानि को प्रदर्शित करता है । यदि शेष विकलन हो तो हानि और यदि शेष समाकलन हो + तो लाभ होता है ।  वसूली खाते के विकलन ( Dr . ) पक्ष  में  - समस्त सम्पत्तियों ( रोकड़ शेष व बैंक शेष को छोड़कर ) को लिखा जाता है ।  वसूली खाते के समाकलन ( Cr . ) पक्ष में - समस्त दायित्वों ( साझेदारों के पूँजी खाते व उनके ऋण खातों तथा संचय को छोड़कर ) को लिखा जाता है । इसके बाद इस खाते में सम्पत्तियों के विक्रय से प्राप्त राशि को समाकलन पक्ष में तथा किये गए दायित्वों के भुगतान का लेखा विकलन पक्ष में किया जाता है ।  विघटन कार्य पू...

साझेदारों के व्यक्तिगत ऋणों का भुगतान ( Payment of Individual Loans of Partners ' )

साझेदारों के व्यक्तिगत ऋणों का भुगतान ( Payment of Individual Loans of Partners ' )  फर्म तथा साझेदारों की निजी सम्पत्तियों का उपयोग निम्नानुसार किया जा सकता है -  1 . फर्म की शेष सम्पत्तियों का उपयोग ( Use of Balance Assets of Firm ) - फर्म के ऋणों का भुगतान करने के बाद फर्म की शेष सम्पत्तियों में से प्रत्येक साझेदार अपने हित तक अपने व्यक्तिगत ऋण का भुगतान कर सकता है ।  2 . साझेदारों की निजी सम्पत्तियों का उपयोग ( Use of Individual Assets of Partners ' ) साझेदारों की निजी सम्पत्तियाँ सर्वप्रथम उनके व्यक्तिगत ऋणों का भुगतान करने में प्रयुक्त होती हैं । इसके बाद शेष सम्पत्तियों को फर्म के ऋणों का भुगतान करने में उपयोग किया जा सकता है , परन्तु ऐसा तभी किया जा सकता है जबकि फर्म की सम्पत्तियाँ फर्म के ऋणों को चुकाने में पर्याप्त न हों ।

फर्म के विघटन पर हिसाब का निपटारा Settlement of Accounts of Dissolution of Firm )

फर्म के विघटन पर हिसाब का निपटारा Settlement of Accounts of Dissolution of Firm )  साझेदारों के बीच स्पष्ट ठहराव के अभाव में फर्म की समाप्ति पर फर्म के हिसाब - किताब का निपटारा करने के लिये निम्नलिखित वैधानिक व्यवस्था है -  ( अ ) फर्म की सभी हानियाँ एवं कमियाँ सबसे पहले फर्म के लाभ से , इसके बाद साझेदारों को पूँजी से तथा आवश्यकता पड़ने पर साझेदारों द्वारा अतिरिक्त राशि लाकर पूरी की जायेंगी ।  ( ब ) फर्म की सम्पत्तियों को बेचने पर प्राप्त होने वाली राशि एवं साझेदारों द्वारा लाई गई राशि का उपयोग निम्नलिखित क्रम में किया जायेगा  ( i ) फर्म के बाहरी ऋणों का भुगतान करने में ,  ( ii ) साझेदारों द्वारा फर्म को दिये गए ऋणों के भुगतान में ,  ( iii ) इसके बाद साझेदारों को उनके पूँजी आधिक्य को वापस करने में ,  ( iv ) और यदि अब भी कुछ राशि शेष है तो यह साझेदारों में उनके लाभ अनुपात में वितरित की जायेगी ।

विघटन के प्रकार या विघटन की परिस्थितियाँ I ( Modes of Dissolution of Firm )

विघटन के प्रकार या विघटन की परिस्थितियाँ I ( Modes of Dissolution of Firm ) साधारणत : साझेदारी का विघटन निम्नलिखित परिस्थितियों में किया जाता है । इन्हें हम विघटन के कारण , विघटन की विधियाँ या विघटन के प्रकार भी कह सकते हैं ।  ( A) न्यायालय के आदेश के बिना समापन ( Dissolution without Court order ) -  1 . समझात द्वारा विघटन ( Dissolution by Agreement ) - जब सभी साझेदार फम का व्यापार समाप्त करने के लिए सहमत हो जाते हैं तब साझेदारी व्यापार समाप्त कर दिया जाता है । इस प्रकार किये गए समापन को हो साझेदारी का , समझौते द्वारा विघटन कहते हैं । जिस प्रकार साझेदारी सब साझेदारों की सहमति से निर्मित होती है , उसी प्रकार सब साझेदारों की सहमति से उसकी समाप्ति भी की जा सकती है ।  2 . अनिवार्य विघटन ( Compulsory Dissolution ) - निम्नलिखित परिस्थितियों में एक फर्म का अनिवार्य विघटन हो जाता है -  ( i ) जब सब साझेदार या एक को छोड़कर शेष सभी दिवालिया हो जाते हैं ,  ( ii ) जब किसी कारण से फर्म का व्यापार अवैध घोषित कर दिया जाता है ,  ( iii ) साझेदारों की संख्या अधिकतम निर्धारित ...

साझेदारी के विघटन का अर्थ ए ( Meaning of Dissolution of Partnership )

साझेदारी के विघटन का अर्थ ए ( Meaning of Dissolution of Partnership )  साझेदारी के विघटन से तात्पर्य फर्म का व्यवसाय बन्द कर उसकी समाप्ति से है । साझेदारी के विघटन को साझेदारी का समापन या साझेदारी का विसर्जन भी कहते हैं । विघटन के कारण साझेदारों के परस्पर सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं । भारतीय साझेदारी अधिनियम , 1932 की व्यवस्थाओं के अनुसार विघटन के दो रूप हो सकते हैं - एक साझेदारी का विघटन और दूसरा फर्म का विघटन । साझेदारी के समापन से फर्म का समापन नहीं होता , किन्तु फर्म के विघटन हो जाने पर साझेदारी का विघटन हो जाता है । किसी नये साझेदार के प्रवेश पर , किसी साझेदार के अवकाश ग्रहण पर या किसी साझी की मृत्यु की दशा में पुरानी साझेदारी समाप्त हो जाती है , किन्तु फर्म का विघटन नहीं होता अपितु नयी साझेदारी की स्थापना कर फर्म को चालू रखा जाता है । अतः सामान्यतः साझेदारी के विघटन से आशय फर्म के ही विघटन से है । विघटन पर फर्म की समस्त सम्पत्तियों का विक्रय कर दिया जाता है तथा प्राप्त राशि से दायित्वों का भुगतान करने के पश्चात् शेष राशि सभी साझेदारों में वितरित कर दी जाती है । साझेदारी के समा...

त्याग अनुपात और लाभ - प्राप्ति अनुपात में अन्तर ( Difference between Sacrificing Ratio and Gaining Ratio )

त्याग अनुपात और लाभ - प्राप्ति अनुपात में अन्तर ( Difference between Sacrificing Ratio and Gaining Ratio ) अन्तर का आधार  1 . आशय  2 . गणना का समय 3 . आवश्य - कता  4 . अनुपात में कमी या वृद्धि  5 . गणना विधि त्याग अनुपात  नये साझेदार के पक्ष में पुराने साझेदार अपने - अपने हिस्से का जिस अनुपात में त्याग करते हैं उस अनुपात को त्याग अनु पात कहा जाता है ।  त्याग अनुपात की गणना किसी नये साझे - दार के प्रवेश पर की जाती है |  पुराने साझेदार नये साझेदार से ख्याति का भुगतान प्राप्त करते हैं । यह भुगतान वे उसी अनुपात में प्राप्त करते हैं जिस अनुपात में उन्होंने अपने हिस्से का त्याग किया है ।  त्याग अनुपात से पुराने साझेदारों का लाभ हानि अनुपात कम हो जाता है ।  पुराने अनुपात से नया अनुपात घटाकर त्याग अनुपात ज्ञात किया जाता है । पुराना अनुपात - नया अनुपात = त्याग अनुपात होता है । ) ख्याति लाभ - प्राप्ति अनुपात  किसी साझेदार के अवकाश ग्रहण करने या मृत्यु हो जाने पर शेष साझेदारों के लाभ के हिस्सों में वृद्धि हो जाती है । जिस अनपात में यह वृद्धि होती ह...