मूल्यह्रास की उत्पत्ति के कारण
( Reasons for Arising Depreciation )
मूल्यहास के प्रमुख कारणों में संपत्ति के प्रयोग के फलस्वरूप होने वाली टूट - फूट ( Wear and Tear ) व घिसाव के अतिरिक्त समय के प्रभाव , अप्रचलन व रिक्तीकरण को सम्मिलित किया जाता है । इनमें से कुछ संपत्तियाँ यथा प्लाण्ट , मशीन , फर्नीचर व फिक्सचर्स तथा माल व सवारी ढोने में प्रयुक्त वाहनों का हास टूट - फूट व प्रयोग के कारण होता है जबकि पट्टे पर ली गई संपत्तियाँ पटटा अवधि के व्यतीत होते जाने के साथ ही साथ हासित होती जाती हैं । संपत्तियों के अंतिम वर्ग में क्षयशील ( Wasting ) संपत्तियाँ सम्मिलित होती हैं । इस वर्ग में खदानें सम्मिलित की जाती हैं जो कि निहित मूल पदार्थ ( खनिज तत्त्व ) की निकासी / दोहन ( रिक्तीकरण / Depletion ) के साथ ही साथ हासित होती जाती है ।
कुछ मशीनें , प्लाण्ट व उपकरण नई वैज्ञानिक खोज के कारण हुए तकनीकी परिवर्तनों ( Technological chances ) के प्रभाव से भी अप्रचलित हो जाते हैं क्योंकि ऐसी मशीनें व उपकरण नई व आधुनिक मशोनों के सामने अनार्थिक ( Uneconomic ) सिद्ध होने लगते हैं फलत : विवश होकर पुरानी तकनीक वाली मशीनों को ( यद्यपि जीवनावधि अभी शेष है ) प्रयोग से हटाकर नई मशीनों की स्थापना करनी पड़ती है ताकि उत्पादन लागतें न्यूनतम स्तर तक रखी जा सकें । मूल्यह्रास के इन विभिन्न कारणों का बिंदुवार विश्लेषण निम्न प्रकार से , हैं -
1 . सम्पत्ति का निरन्तर प्रयोग ( Continuous consumption of assets ) - किसी भी स्थायी सम्पत्ति का मूल्य उसकी कार्यक्षमता अथवा उसकी उपयोगिता के कारण ही अधिक या कम होता है । व्यापार में । सम्पत्तियों का निरन्तर प्रयोग होने से उनकी कार्यक्षमता घटती जाती है । मशीन , ट्रक , फर्नीचर , औजार आदि सम्पत्तियों में ट - फूट ( Wear and tear ) भी होती रहती है । अत : स्थायी सम्पत्तियों को कार्यक्षमता घट जाने व उनमें टूट - फूट हो जाने से उनके मूल्य में कमी आ जाती है ।
2 . अप्रचलन ( Obsolescence ) - पुरानी स्थायी सम्पत्तियों का व्यवसाय में प्रयोग से बाहर हो जाना अथवा चलन में नहीं रहना ही सम्पत्तियों का अप्रचलन कहलाता है । प्रतिदिन नये - नये आविष्कारों के कारण नयी आविष्कृत उन्नत तकनीक वाली सम्पत्तियाँ बाजार में उपलब्ध रहती हैं जो पुरानी सम्पत्तियों की तुलना में | अधिक कार्यकुशल होती है । प्रतिस्पर्धा के इस युग में व्यवसाय को उत्तरोत्तर सफलता के लिए आधुनिक सम्पत्तियों का प्रयोग करना अनिवार्य हो जाता है । नई सम्पत्तियों के प्रयोग से न केवल उत्पादन में वृद्धि होती है वरन् उत्पादन को लागतों को भी घटाया जा सकता है । इस तरह पुरानी सम्पत्तियों के स्थान पर नयी सम्पत्तियों का प्रयोग प्रारंभ हो जाता है और पुरानी सम्पत्तियाँ चलन से बाहर हो जाती हैं । पुरानी सम्पत्तियों के पुस्त मूल्य व विक्रय मूल्य को अन्तर राशि को अप्रचलन की हानि मान कर लेखा पस्तकों में दर्ज किया जाता है ।
3 . मूल पदार्थों की समाप्ति ( Exhaustion of subject matter ) — पट्टे पर प्राप्त की गई खदान जैसी स्थायी सम्पत्तियाँ उनमें उपलब्ध खनिज पदार्थों के कारण मूल्यवान होती हैं । किन्तु जैसे - जैसे उनमें से खनिज पदार्थ निकाले जाते हैं वैसे - वैसे उनका मूल्य भी घटते जाता है । कुछ समय बाद इस प्रकार की सम्पत्तियों का मूल्म शून्य रह जाता है । अत : खनिज पदार्थों की मात्रा घटने से इनके मूल्य में शनैःशनै : आने वाली कमी को मूल पदार्थों की समाप्ति से होने वाला ह्रास कहा जाता है ।
4 . समय का व्यतीत होना ( Emuxion or expiration of time ) — समय के व्यतीत होने के साथ साथ नई सम्पत्तियाँ भी पुरानी होते जाती हैं , चाहे फिर सम्पत्तियों का उपयोग किया गया हो अथवा उपयोग न किया गया हो । पट्टे पर प्राप्त की गई खदान , मोटर गाड़ी आदि सम्पत्तियों का मूल्य समय बीतने के साथ घटते जाता है ।
5 . बाजार मूल्य का गिरना ( Fall of market price ) — कभी - कभी सम्पत्ति का मूल्य बाजार में स्थायी रूप से घट जाता है और इसके पुन : बढ़ने की संभावना नहीं रहती है , तब मूल्य की इस कमी को मूल्यहास कहा जाता है ।
6 . दुर्घटना के कारण ( Due to accident ) — प्राकृतिक दुर्घटनाओं जैसे - अग्नि , भूकम्प , बिजली गिरना आदि कारणों से या किसी अन्य आकस्मिक कारण से कभी - कभी स्थायी सम्पत्तियाँ दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है । दुर्घटनाग्रस्त सम्पत्ति की मरम्मत कर उसका उपयोग तो किया जा सकता है किन्तु उसकी मौलिक कार्यकुशलता की वापसी संभव नहीं होती , परिणामतः सम्पत्ति का मूल्य घट जाता है ।
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