स्थायी किस्त एवं घटती शेष पद्धति में अन्तर ( Difference between Fixed Instalment & Reducing Balance Method )
स्थायी किस्त एवं घटती शेष पद्धति में अन्तर ( Difference between Fixed Instalment & Reducing Balance Method )
अन्तर का आधार
1 . ह्रास की गणना इस
2 . ह्रास की राशि
3 . ह्रास की दर
4 . लाभ - हानि पर पड़ने वाला भार 5 . वैधानिक मान्यता
6 . उपयोगिता
7 . सरलता
8 . औचित्य
9 . सम्पत्ति का मूल्य
स्थायी किस्त पद्धति
इस पद्धति में प्रतिवर्ष ह्रास की गणना सम्पत्ति की मूल लागत पर की जाती है ।
इस पद्धति के अनुसार प्रतिवर्ष ह्रास की राशि एक समान रहती है ।
इस पद्धति में ह्रास की दर सामान्यतः कम ही रहती है ।
इस पद्धति में ह्रास की राशि प्रतिवर्ष समान रहती है अत : मरम्मत व ह्रास का भार लाभ - हानि खाते पर समान रूप से नहीं पड़ता ।
इस पद्धति को आयकर विधान द्वारा मान्यता नहीं मिली है ।
यह पद्धति कम जीवन वाली तथा कम मूल्य वाली सम्पत्तियों के लिए उपयोगी है ।
इस पद्धति में गणना क्रियाएँ सरल होती हैं ।
इस पद्धति में ह्रास की गणना सम्पत्ति की कार्यक्षमता को ध्यान में रखकर नहीं की जाती , अतः यह उचित नहीं है ।
इस पद्धति के अनुसार सम्पत्ति के मूल्य को शून्य तक अपलिखित किया जा सकता है ।
घटती शेष पद्धति
इस पद्धति अनुसार प्रतिवर्ष ह्रास की गणना सम्पत्ति के प्रारम्भिक शेष पर की जाती है ।
इस प्रद्धति में प्रतिवर्ष ह्रास की राशि कम होती जाती है ।
इस पद्धति अनुसार ह्रास की दर ऊँची रहती है ।
इस पद्धति अनुसार ह्रास व मरम्मत का भार लाभ - हानि खाते पर समान रूप से पड़ता है ।
यह पद्धति आयकर विधान द्वारा मान्य है ।
यह पद्धति अधिक लागत वाली तथा दीर्घ जीवन अवधि वाली सम्पत्तियों के लिए उपयोगी है ।
यह पद्धति अपेक्षाकृत कठिन है ।
यह पद्धति न्यायोचित है क्योंकि सम्पत्ति की कार्यक्षमता घटने के साथ - साथ ह्रास की राशि भी घटती जाती है ।
इस पद्धति के अनुसार सम्पत्ति का मूल्य कभी भी शून्य तक नहीं लाया जा सकता ।
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