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मूल्यह्रास की राशि को निर्धारित करने वाले तत्त्व

मूल्यह्रास की राशि को निर्धारित करने वाले तत्त्व 
( Factors Determining the Amount of Depreciation )

किसी सम्पत्ति पर प्रतिवर्ष कितना मूल्यह्रास लगाया जाए , यह एक महत्त्वपूर्ण कार्य है , जो कि व्यापार का आर्थिक स्थिति को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है , अत : उचित मूल्यह्रास आयोजन के लिए नियोजकों को निम्नांकित तथ्यों पर विशेष ध्यान देना चाहिए -

1 . सम्पत्ति की लागत ( Cost of the assets ) — सम्पत्ति की लागत ज्ञात करने के लिए सम्पत्ति के क्रय मूल्य में उन समस्त व्ययों को जोड़ दिया जाता है जो उसको लाने व चालू करने के लिए किये गए होते हैं । यदि पुरानी सम्पत्ति खरीदी जाती है तो उसकी मरम्मत का व्यय भी लागत में शामिल किया जाता है । अतः सम्पत्ति की लागत = क्रयमूल्य + परिवहन व्यय + स्थापना व्यय होता है ।

2 . सम्पत्ति का जीवनकाल ( Life of the assets )  सम्पत्ति के जीवनकाल से आशय उस अनुमानित अवधि से है जिसमें किसी सम्पत्ति का प्रयोग किया जा सकता है । अर्थात् सम्पत्ति की कार्य अवधि को उसका जीवनकाल कहा जाता है । सम्पत्ति की कार्य अवधि क्या होगी इसका निर्णय अनुभव एवं दूरदर्शिता पर आधारित सम्पत्ति की लागत को उसकी अनुमानित जीवन अवधि में बाँट कर प्रतिवर्ष लिखी जाने वाली ह्रास की राशि ज्ञात की जा सकती है । 

3 . सम्पत्ति का अवशिष्ट मूल्य ( Residual or scrap or break - up value of the assets )   सम्पत्ति कार्य अवधि समाप्त हो जाने के बाद सम्पत्ति अनुपयोगी हो जाती है और उसका विक्रय कर दिया जाता है ।
अत : अवशिष्ट मूल्य से आशय सम्पत्ति का जीवनकाल समाप्त हो जाने के बाद उसके विक्रय से प्राप्त होने वाली अनुमानित विक्रय राशि से है । मशीन , फर्नीचर आदि सम्पत्तियों का गवशिष्ट मूल्य होता है किन्तु पट्टे पर प्राप्त की गई खदानें , पेटेण्ट आदि सम्पत्तियों का कोई भी अवशिष्ट मूल्य नहीं होता । हास की गणना में अवशिष्ट मूल्य को ध्यान में रखना आवश्यक है ।

4 . सम्पत्ति का स्वभाव ( Nature of the assets ) - व्यवसाय में सम्पत्ति को उपयोगिता को ध्यान में रख कर ही 6 वार्षिक हास को राशि निर्धारित की जाती है । यदि सम्पत्ति की 17 उपयोगिता प्रतिवर्ष समान रहे तो वार्षिक हास की राशि भी प्रतिवर्ष | 8 समान रखी जाती है और यदि उसकी उपयोगिता घटते क्रम में हो तो हास की राशि भी प्रतिवर्ष घटते क्रम में रखी जाती है ।

5 . सम्पत्ति का प्रयोग ( Use of the assets )  — व्यवसाय जिस सम्पत्ति का प्रयोग अधिक किया जाता है उस सम्पत्ति के मूल्य में ह्रास भी अधिक होगा । अत : सम्पत्ति के उपयोग को ध्यान में रख कर हास की राशि निर्धारित की जाती है । 

6 . अप्रचलन की सम्भावना ( Possibility of obsolescence ) - व्यवसाय की ऐसी सम्पत्ति जिसके अप्रचलन की सम्भावना अधिक होती है उस पर ह्रास अधिक लगाया जाता है और जिस सम्पत्ति पर यह सम्भावना कम होती है उस पर हास की राशि अपेक्षाकृत कम ही निर्धारित की जाती है ।

7 . मरम्मत एवं नवकरण ( Repairs and renewals )  — सम्पत्ति की समय - समय पर मरम्मत कर उसे नयो बनाए रखने से उसके जीवनकाल में वृद्धि होती है । अत : इस परिस्थिति में सम्पत्ति पर हास की दर कम रखी जाती है ।

8 . सम्पत्ति में विनियोजित पूँजी पर ब्याज ( Interest on capital invested )  — व्यवसाय की पूंजी का । वह भाग जिससे स्थायी सम्पत्ति को खरीदा गया है यदि सम्पत्ति के स्थान पर अन्यत्र विनियोजित किया जाता तो इस विनियोजन से कितना व्याज प्राप्त होता । इस बात को भी ध्यान में रखकर वार्षिक हास की राशि ज्ञात की जाती है ।

9 . कम्पनी अधिनियम व आयकर के नियमों का पालन ( Observancy of company law and Income tax Act )  — वार्षिक हास की गणना करते समय कम्पनी अधिनियम 1956 की धारा 205 एवं 350 तथा अनुसूची XIV का अध्ययन आवश्यक है । इसी तरह आयकर नियम के अन्तर्गत दी गई विभिन्न छूट ( rebate ) को ध्यान में रखा जाता है ।

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