क्या लाभ होने पर ही ह्रास का आयोजन करना चाहिए ?
व्यवसाय में स्थायी सम्पत्तियों का प्रयोग लाभार्जन हेतु किया जाता है । इनके निरन्तर उपयोग से इनक मूल्य में कमी आती है । इस प्रकार यह कमी लाभार्जन हेत किये जाने वाले अन्य व्ययों की भाँति होती है । सम्पत्ति के मूल्य में इस प्रकार आई कमी या ह्रास को अन्य व्ययों की भाँति लाभ - हानि खाते के नामे पक्ष में अंकित किया जाता है । सम्पत्ति पर खर्च उत्पादक व्यय माना जाता है अत : हास की व्यवस्था लाभ में से नहीं की जाती है , वरन् हास की व्यवस्था करने के बाद ही लाभ का मूल्यांकन किया जाता है । यदि व्यापार में लाभ नहीं वरन् हानि हो रही हो तब भी ह्रास की व्यवस्था की जाती है , भले ही हानि अधिक हो जाये । जिस प्रकार व्यापार में लाभ हो या हानि , प्रत्येक दशा में नौकर की सेवाओं के बदले वेतन देना आवश्यक होता है , उसी प्रकार " हास व्यवसाय का कोई दान नहीं जो कि लाभ होने पर ही दिया जाता हो , बल्कि यह व्यय प्रभार है जिसकी व्यवस्था प्रत्येक परिस्थितियों में आवश्यक है । "
उच्चावचन का अर्थ ( Meaning of fluctuation ) — बाजार में स्थायी सम्पत्तियों की माँग और उसकी पूर्ति में होने वाले परिवर्तन से सम्पत्तियों के मूल्य भी घटते तथा बढ़ते रहते हैं । यह परिवर्तन निरन्तर जारी रहता है फलस्वरूप सम्पत्तियों के मूल्य में होने वाली कमी या वृद्धि स्थायी नहीं रहती । उच्चावचन बाजार की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है , जिसमें सम्पत्ति के मूल्य में कमी होने पर इसे मूल्यह्रास नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह कमी अस्थायी होती है और कुछ समय बाद सम्पत्ति के मूल्य में वृद्धि भी हो सकती है ।
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