नये साझेदार का प्रवेश ( Admission of a New Partner )
नये साझेदार के प्रवेश की आवश्यकता ( Necessity of Admitting a New Partner ) - भारतीय साझेदारी अधिनियम , 1932 की धारा 31 ( 1 ) के अनुसार फर्म में किसी नये साझेदार का प्रवेश फर्म में विद्यमान सभी साझेदारों की सहमति से ही हो सकता है । फर्म में प्रवेश के बाद नया साझेदार फर्म द्वारा किये गये सभी कार्यों के लिए उत्तरदायी होता है , किन्तु प्रवेश के पूर्व के कार्यों के लिए उसे उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता । सामान्यत : निम्नलिखित कारणों से फर्म में नये साझेदार को प्रवेश दिया जाता है -
1 . पूँजी की आवश्यकता — जब फर्म का व्यापार धीरे - धीरे बढ़ने लगता है और विस्तार के लिए फर्म को अधिक पूँजी की आवश्यकता पड़ती है तो फर्म में नये साझेदार को प्रवेश देकर पूँजी की आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है ।
2 . विशिष्ट निपुणता एवं योग्यता - जब फर्म को किसी विशिष्ट योग्यता , निपुणता तथा अनुभवी व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती है तो नये साझेदार को प्रवेश दिया जाता है तथा फर्म के हित में उसका लाभ उठाया जा सकता है ।
3 . प्रतिस्पर्धा समाप्त करना - जब कोई व्यक्ति फर्म पतिस्पर्धात्मक स्वरूप का कोई कार्य करता है तो ऐसे व्यक्ति फर्म में साझेदार बनाकर प्रतिस्पर्धा समाप्त की जा सकती है ।
4 . कर्मचारियों को हिस्सा - जब फर्म में किसी पुराने अनुभवी , कुशल तथा ईमानदार कर्मचारी को लाभ में हिस्सा देकर साझेदार बनाकर उसे प्रोत्साहित करना हो ।
5 . पुराने साझेदार के अलग होने या मत्य होने मायेदार के अलग होने या मृत्यु होने कारण — कभी - कभी नये साझेदार के प्रवेश की आवश्यकता इसलिए भी पड़ती है जब की फर्म से कोई साझेदार अवकाश ग्रहण करता है या उसकी मृत्यु हो जाती है ।
6 . विदेश में कारोबार यदि कोई फर्म विदेश में भी व्यवसाय करना चाहती है तो इस परिस्थिति में इस व्यवसाय के संचालन के लिये विदेशी व्यक्ति को साझेदार बनाया जा सकता है ।
7 . व्यापार की लाभार्जन शक्ति बढ़ाने हेतु किसी फर्म में व्यवसाय की लाभार्जन शक्ति बढ़ाने हेतु किसी ऐसे नये व्यक्ति को साझेदार बनाया जा सकता है जो व्यावसायिक चातुर्यता का धनी है ।
नये साझेदार के अधिकार ( Rights of New Partner )
जब कोई नया व्यक्ति किसी साझेदारी व्यवसाय में साझेदार के रूप में प्रवेश करता है तो उसे प्रवेश करते ही , निम्नलिखित मुख्य दो अधिकार प्राप्त होते हैं -
( i ) फर्म की सम्पत्तियों में हिस्सा पाने का अधिकार - इस अधिकार को प्राप्त करने के लिये नया साझेदार समझौते द्वारा निर्धारित पूँजी की रकम फर्म को अदा करता है ।
( ii ) फर्म के भावी लाभों में हिस्सा पाने का अधिकार - इस अधिकार को प्राप्त करने के लिये नया साझेदार अपने हिस्से की ख्याति की रकम , पुराने साझेदारों को अदा करता है । जिन्होंने अपने हिस्से का त्याग उसके लिये किया है ।
2 . नये लाभ - हानि विभाजन अनुपात की गणना ( Calculation of New P / L Division Ratio ) - नये साझी के प्रवेश पर नये लाभ - हानि विभाजन अनुपात की गणना करनी पड़ती है । नये साझी को हिस्सा देने से पुराने साझियों के हिस्से प्रभावित होते हैं फलस्वरूप पुराने विभाजन अनुपात में परिवर्तन हो जाता है । साझेदारों का नया लाभ - हानि विभाजन अनुपात परस्पर समझौते के आधार पर निर्धारित किया जाता है । प्रायः नया अनुपात निम्नलिखित विधियों में किसी एक विधि से ज्ञात किया जाता है -
( i ) जब पुराने साझेदार अपना पुराना अनुपात यथावत् रखना चाहें — इस परिस्थिति में फर्म का कुल हिस्सा 1 मान लिया जाता है तथा इसमें से नये साझी को दिया जाने वाला हिस्सा घटा दिया जाता है तत्पश्चात् शेष बचे हुए हिस्से को पुराने साझेदारों के पुराने अनुपात में गुणा कर नया अनुपात ज्ञात किया जाता है ।
उदाहरण 1 . एक फर्म में प्रशान्त व निशान्त साझेदार हैं जिनका लाभ - हानि अनुपात 3 : 2 है । उन्होंने मोहित को 1 / 4 भाग देकर साझेदार बनाया । यदि पुराने साझेदारों का पुराना अनुपात यथावत् रखा जाय तो नया अनुपात क्या होगा ?
हल : माना कि फर्म का कुल हिस्सा 1 है । मोहित को 1 / 4 भाग दिया तो -
शेष हिस्सा = 1 - 1 = 3
4 4
, जिसे प्रशान्त व निशान्त 3 : 2 में प्राप्त करेंगे -
प्रशान्त का नया हिस्सा = 3 का 3 = 9
4 5 20
निशान्त का नया हिस्सा = 3 का 2 = 6
4 5 20
मोहित का हिस्सा = 1 या = 5
4 20
__________________________
नया अनुपात होगा -
9 : 6 : 5 या 9:6:5
20 20 20
( ii ) जब पुराने साझेदार नये साझी को समान भाग ( अनुपात ) में हिस्सा देना चाहे - इस परिस्थिति म नय साझी को दिया जाने वाला हिस्सा पराने साझेदारों की संख्या में विभाजित कर दिया जाता है तथा प्रत्येक पुराने साझेदार के हिस्से में से नये साझी को दिया जाने वाला हिस्सा घटाकर नया अनुपात ज्ञात किया जाता है ।
उदाहरण 2 . उपर्युक्त उदाहरण 1 में यदि मोहित अपना हिस्सा प्रशान्त व निशान्त से समान भाग में प्राप्त करता हो तो नया अनुपात क्या होगा ?
हल : मोहित के साझेदारी में सम्मिलित होने के पूर्व साझेदारों की संख्या 2 है , अत : मोहित को मिलने वाला हिस्सा 2 बराबर भाग में बाँटा जायेगा अर्थात् -
1 × 1 = 1
4 2 8
भाग मोहित प्रत्येक साझेदार से प्राप्त करेगा । प्रशान्त व निशान्त प्रत्येक का हिस्सा 1
8 भाग से कम हो जायेगा ।
प्रशान्त का नया हिस्सा
= 3 - 1 = 24 - 5 = 19
5 8 40 40
निशान्त का नया हिस्सा
2 - 1 = 16 - 5 = 11
5 8 40 40
मोहित का हिस्सा = 1 या = 10
4 10
अत : नया अनुपात =
= 19 : 11 : 10 या 19 : 11 : 10
40 40 40
( iii ) जब पुराने साझेदार नये साझी को असमान भाग ( अनुपात ) में हिस्सा देना चाहें इस परिस्थिति में पुराने साझेदारों के हिस्से में से उनके द्वारा नये साझी को दिया जाने वाला हिस्सा घटाकर नया अनुपात ज्ञात किया जाता है ।
उदाहरण 3 . उपर्युक्त उदाहरण 1 में यदि मोहित अपने हिस्से का 3 / 4 भाग प्रशान्त से तथा 1 / 4 भाग निशान्त से प्राप्त करता हो तो नया अनुपात क्या होगा ?
हल : मोहित प्रशान्त से प्राप्त करता है
1 का 3 = 3 भाग
4 4 16
मोहित निशान्त से प्राप्त करता है
1 का 1 = 1 भाग
4 4 16
* प्रशान्त का नया हिस्सा
= 3 - 3 = 48 - 15 = 33
5 16 80 80
निशान्त का नया हिस्सा
= 2 - 1 = 32 - 5 = 27
5 16 80 80
मोहित का हिस्सा
= 1 या = 20
4 80
अत : नया अनुपात
= 33 : 27 : 20 या 33 : 27 : 20
80 80 80
( iv ) जब पुराने साझेदारों में से कोई एक साझी नये साझी को हिस्सा देना चाहे — इस परिस्थिति में नये साझी को दिया जाने वाला भाग पुराने साझेदार ( जो हिस्सा दे रहा है ) के हिस्से में से घटा दिया जाता |
उदाहरण 4 . उपर्युक्त उदाहरण 1 में मोहित अपना हिस्सा यदि प्रशान्त से प्राप्त करता हो तो नया अनुपात क्या होगा ?
हल : प्रशान्त का नया हिस्सा
= 3- 1 = 12 - 5 = 7
5 4 20 20
निशान्त का हिस्सा
= 2
5
मोहित का हिस्सा
= 1
4
अत : नया अनुपात
= 7 : 2 : 1 या 7 : 8 : 5
20 5 4 20 20 20
या सरल अनुपात 7 : 8 : 5 .
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