5 . साझेदारों की पूँजी का समायोजन ( Adjustment of Partners ' Capital )
नये साझेदार के प्रवेश के समय कभी - कभी पुराने साझेदारों के बीच समझौता हो जाता है कि समायोजन के बाद साझेदारों के पूजी खाते उनके लाभ - हानि विभाजन के अनुपात में पन : समायोजित कर लिये जायेंगे , अर्थात् साझेदारों की पूजी नये लाभ - हानि विभाजन के अनुपात में रखी जाएगी , यह न्यायसंगत भी होता हैं । समायोजन के फलस्वरूप यदि पुराने साझेदारों की पूँजी अधिक होती है तो वे अधिक पूँजी को व्यापार से निकाल लेंगे और इसके विपरीत यदि उनकी पूँजी कम प्रतीत होती है , तो उनसे और पूँजी मँगायी जाती है , इस तरह पुराने साझेदारों के पूँजी खाते नये साझेदार के पूँजी खाते के अनुपात में समायोजित कर दिये जाते । हैं । पूँजी का समायोजन निम्न दो स्थितियों में किया जाता है -
( i ) नया साझेदार जब आनुपातिक पूँजी फर्म में लाता है — कभी - कभी नये साझेदार को प्रवेश देते समय पुराने साझेदारों द्वारा यह शर्त लगायी जाती है कि नया साझेदार अपने हिस्से की उतनी पूँजी लायेगा जितनी उनके लाभ - विभाजन अनुपात के अनुसार पुराने साझेदारों से सम्बन्धित पूँजी खातों को समायोजित करने पर निकलती है । ऐसी स्थिति पर पराने साझेदारों के पूँजी खाते का शेष सभी समायोजन करने के बाद ज्ञात कर लेना चाहिए , इसके बाद पुराने सभी साझेदारों के पूँजी का योग कर लेना चाहिए और इसके आधार पर फर्म की कुल पूंजी ज्ञात करनी चाहिए अर्थात पराने साझेदारों के लाभ के भाग के आधार पर नयी फर्म की कुल पूँजी ज्ञात हो जाती है । इस कल पंजी में से पुराने साझेदारों की पूँजी का योग घटाकर नये साझेदार द्वारा दी जाने वाली पूँजी की राशि ज्ञात कर ली जाती है ।
( ii ) नये साझेदार के पूंजी के अनुपात में सभी साझेदारों के पूँजी खातों का समायोजन नये । साझेदार के प्रवेश पर कभी - कभी उसके द्वारा लायी जाने वाली पूँजी के सम्बन्ध में यह समझौता होता है कि नये . साझेदार द्वारा लायी गयी पँजी के अनुपात में शेष साझेदारों के पूँजी खाते समायोजित किये जायेंगे । ऐसी स्थिति भनय साझेदार के पँजी के भाग के आधार पर फर्म की कुल पूँजी की रकम ज्ञात कर ली जाती है । इसके पश्चात् सभी साझेदारों का नया लाभ - हानि विभाजन का अनुपात ज्ञात करके फर्म को कुल नयी पूँजी ज्ञात करनी चाहिए । अब देखना चाहिए कि साझेदार की नयी आनुपातिक पूँजी फर्म में विनियोजित पूँजी से अधिक आती । है तो ऐसे साझेदार से अन्तर की पूँजी उस साझेदार से नकद मँगायी जायेगी और यदि विनियोजित पूँजी पातक पंजी से अधिक हो तो इस अधिक रकम का साशवार फम सातकाल लगा । इस तरह नय साझदार अधिक रकम को साझेदार फर्म से निकाल लेगा । इस तरह नये साझेदार १ अनुपात में सभी साझेदारों के पंजी खाते समायोजित हो जाते हैं ।
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