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साझेदार की निवृत्ति ( Retirement of Partner )

साझेदार की निवृत्ति ( Retirement of Partner ) धारा 32 ( साझेदारी अधिनियम ) के अनुसार एक साझेदार शेष सभी साझेदारों की सहमति से साझेदारी के स्पष्ट ठहराव के अनुसार अवकाश ग्रहण कर सकता है या जब साझेदारी ऐच्छिक होती है तो शेष सभी साझेदारों को अपने अवकाश ग्रहण की सूचना देकर अवकाश ग्रहण कर सकता है । अतः जब किसी फर्म का कोई साझेदार किसी भी कारण से स्वयं को फर्म से पृथक करता है तो इसे साझेदार की निवृत्ति या साझेदार का अवकाश ग्रहण कहा जाता है । 

प्राय : निम्न दशाओं में कोई साझेदार फर्म से अवकाश ग्रहण कर सकता है - 

( i ) बीमारी या शारीरिक कमजोरी के कारण .
( ii ) वृद्धावस्था के कारण , 
( iii ) किसी साझेदार से मतभेद होने के कारण , 
( iv ) कोई अधिक लाभप्रद कार्य करने की इच्छा होने के कारण , 
( v ) जव साझेदार पागल दिवालिया अथवा देशद्रोही हो जाये , 
( vi ) साझेदार स्थायी रूप से अलग रहने का निश्चय कर ले , 
( vii ) अन्य किसी कारण से जिससे वह फर्म में रहना उचित न समझे ।

 वैधानिक स्थिति ( Legal Position ) — साझेदारी अधिनियम के अनुसार , साझेदारी में किसी भी प्रकार के परिवर्तन से साझेदारी का अन्त हो जाता है , किन्तु फर्म की समाप्ति नहीं होती । किसी साझेदार के निवृत्त हो जाने के पश्चात् शेष साझेदार पुन : समझौता कर साझेदारी व्यवसाय को नये रूप से चला सकते हैं । अतः शेष साझेदारों की नई साझेदारी स्थापित हो जाती है । 

 निवृत्त साझेदार को या मृतक साझेदार के उत्तराधिकारी को उसके हिस्से की पूँजी , लाभ तथा सामान्य । संचिति , ख्याति आदि समस्त रकमों को प्राप्त करने का अधिकार होता है । वैधानिक दृष्टि से निवृत्त साझी अपने कार्यकाल के दायित्व के लिये उत्तरदायी रहता है , किन्तु व्यवहार में अलग होने वाले साझेदार को उसके हिस्से की रकम देकर उसे उसके दायित्व से मुक्त कर दिया जाता है । उसके दायित्व को शेष साझी अपने ऊपर ले लेते हैं और सार्वजनिक सूचना देकर उसे फर्म के दायित्व से मुक्त घोषित कर देते हैं ।

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