साझेदारी लेखे – साझेदारी सामान्य [ PARTNERSHIP ACCOUNTS : PARTNERSHIP GENERAL ]
परिचय ( Introduction )
मनुष्य स्वभाव से ही आत्मविश्वासी तथा स्वाभिमानी होता है । जहाँ तक सम्भव होता है वहाँ तक सभी कार्य स्वयं करता है । वह दूसरे की सहायता लेने में हीनता महसूस करता है । इसलिए व्यापार के क्षेत्र में एकाकी व्यवसाय की ओर ध्यान दिया जाता था , किन्तु वर्तमान युग में व्यापार का पैमाना विस्तार ( विकास ) की ओर है तथा एकाकी व्यापार की कुछ सीमाएँ होती हैं , जो कि वर्तमान व्यावसायिक युग में अपर्याप्त होती हैं , क्योंकि एकाकी व्यापारी के साधन तथा कार्यक्षमता , जोखिम उठाने को शक्ति सीमित होती है । यदि व्यवसाय बड़े पैमाने | में संचालित करना है तो इसके लिए अधिक पूँजी , अधिक श्रम एवं कुशलता की आवश्यकता पड़ती है , किन्तु हर व्यक्ति पूर्णत : साधन सम्पन्न नहीं होता , इसलिए इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए साझेदारी संगठन का जन्म हुआ । साझेदारी में कई व्यक्ति आपसी सहयोग से पूँजी लगाते हैं और व्यापार का संचालन करते हैं । वे व्यक्ति जो साझेदारी व्यवसाय में सम्मिलित होते हैं व्यक्तिगत रूप से साझेदार या भागीदार ( Partner ) तथा समूह में फर्म ( Firm ) कहे जाते हैं ।
साझेदारी की परिभाषा ( Definition of Partnership )
भारतीय साझेदारी अधिनियम , 1932 की धारा 4 के अनुसार , साझेदारी की परिभाषा -
“ साझेदारी उन व्यक्तियों का पारस्परिक सम्बन्ध है , जिन्होंने किसी ऐसे व्यापार के लाभ को । परस्पर बाँटने का समझौता किया हो जो उन सबके द्वारा या उनमें से किसी एक के द्वारा सबके लिए | चलाया जाता है । "
एल . एच . हैने के अनुसार , “ साझेदारी विभिन्न व्यक्तियों का आपसी सम्बन्ध है , जिन्होंने ऐसे व्यवसाय के लाभ को आपस में बाँटने का निश्चय किया है , जो या तो उन सभी के द्वारा या उनमें से एक के द्वारा सबके लिए चलाया जाता है ।
साझेदारी की विशेषताएँ एवं लक्षण ( Characteristics of Partnership )
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर साझेदारी संस्था की निम्न विशेषताएँ हैं -
1 . व्यवसाय साझेदारी संगठन के लिये व्यवसाय या कारोबार का होना आवश्यक है , जब तक व्यवसाय अस्तित्व में नहीं आता या ऐसा कुछ नहीं किया जाता जिससे व्यवसाय को प्रारम्भ हुआ माना जा सके , तब तक साझेदारी की विद्यमानता का प्रश्न ही नहीं उठता ।
2 . एक से अधिक व्यक्ति होना – साझेदारी संगठन में कम से कम दो व्यक्ति तथा अधिकतम 20 व्यक्ति हो सकता हैं | बैंकिंग व्यवसाय में अधिकतम 10 व्यक्ति होने चाहिए । यदि किसी साझेदारी संगठन में 2 से कम तथा 20 से अधिक व्यक्ति होंगे तो साझेदारी वैध नहीं मानी जायेगी ।
3 . साझेदारों के बीच समझौता - साझेदारी का जन्म ही अनबन्ध से होता है । अत : यह आवश्यक है कि जावेदारों के बीच समझौता हो , समझौता लिखित अथवा मौखिक भी हो सकता है , किन्तु लिखित समझौता साझेदारों के हित में होता है ।
4 .साझेदारी का उद्देश्य लाभ कमाना तथा बाँटना साझेदारी का उद्देश्य लाभ कमाना एवं आपस में वितरित करना होना चाहिए । यदि कोई कार्य परोपकार की दृष्टि से किया जाये तो यह साझेदारी नहीं मानी जायेगी ।
5 . व्यापार का संचालन — साझेदारी में यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक साझेदार व्यवसाय के संचालन में सक्रिय रूप से भाग ले । संचालन सभी साझेदार या उनमें से कोई एक साझेदार भी कर सकता है । प्रत्येक साझेदार अपने साझेदारों का प्रतिनिधि होता है तथा उसके द्वारा किये गये कार्य के लिए साझेदारी के सभी साझेदार उत्तरदायी माने जायेंगे ।
6 . असीमित दायित्व — फर्म के ऋण के भुगतान के लिए सामान्यतः प्रत्येक साझेदार का दायित्व असीमित होता है जो कि सम्मिलित तथा पृथक् दोनों प्रकार का हो सकता है ।
7 . अलग अस्तित्व नहीं वैधानिक दृष्टि से साझेदार और फर्म दोनों एक - दूसरे से अलग होकर भी एक ही माने जाते हैं ।
8 . साझेदारी के अधिकार हस्तान्तरण पर प्रतिबन्ध कोई भी साझेदार अन्य साझेदारों को सहमति के ' बिना अपना हिस्सा किसी अन्य व्यक्ति को बेच या हस्तान्तरित नहीं कर सकता ।
9 . फर्म का निश्चित नाम फर्म का एक निश्चित नाम होना आवश्यक है ।
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