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साझेदार की मृत्यु ( Death of a Partner )

साझेदार की मृत्यु ( Death of a Partner )

 जब फर्म के किसी साझेदार की मृत्यु हो जाती है तो इस स्थिति में विधानत : साझेदारी का भी समापन हो जाता है । किन्तु व्यवहार में साझेदारी व्यवसाय को समाप्त नहीं किया जाता । शेष साझेदार नया अनुबंध कर साझेदारी व्यवसाय को वैसे ही चालू रखते हैं जैसे कि किसी साझेदार के अवकाश लेने के बाद व्यवसाय को चालू रखा जाता है ।

 जब किसी साझेदार की मृत्यु हो जाती है तो मृतक साझेदार के हिस्से की राशि निर्धारित करने के लिए फर्म की बहियों में उसी प्रकार समायोजन किये जाते हैं जिस प्रकार अवकाश ग्रहण पर किये जाते हैं । लेखा प्रविष्टि के दृष्टिकोण से साझेदार के अवकाश ग्रहण और मृत्यु में केवल निम्नांकित दो प्रमुख अंतर हैं 

( i ) अवकाश ग्रहण तथा मृत्यु का दिन - अवकाश ग्रहण करने वाला साझेदार सामान्यत : लेखा वर्ष के अन्तिम दिन से अवकाश ग्रहण करता है परन्तु साझेदार की मृत्यु वर्ष में कभी - भी हो सकती है अत : इस स्थिति में मृतक साझेदार की देय राशि ज्ञात करते समय मृत्यु से पूर्व फर्म के अन्तिम लेखों को तैयार करने की तिथि से मृत्यु तिथि तक के व्यवहारों को हिसाब में लिया जाता है ।

( ii ) देय राशि का भुगतान - अवकाश ग्रहण में अवकाश लेने वाले साझेदार को देय राशि का भुगतान किया जाता है किन्तु मृत्यु की दशा में मृतक साझेदार के वैध उत्तराधिकारी को देय राशि का भुगतान किया जाता

साझेदार के उत्तराधिकारी को देय राशि की गणना ( Calculation of Amount due to the Representatives of the Deceased Partner )

 मृतक साझेदार के उत्तराधिकारी को सामान्यत : फर्म से उन राशियों को प्राप्त करने का अधिकार होता है जिन्हें मृतक साझेदार के पूँजी खाते में क्रेडिट ( जमा ) पक्ष में दर्शाया गया है । इस प्रकार की राशियाँ निम्नानुसार होती हैं -
 ( i ) मृत्यु तिथि को मृतक साझेदार के पूँजी खाते व चालू खाते का क्रेडिट शेष । 

( ii ) संलेख के अनुसार मृत्यु तिथि तक पूँजी पर ब्याज , वेतन , कमीशन आदि यदि प्रावधान हो ।

 ( iii ) फर्म के संचित कोष , अविभाजित लाभ में हिस्सा यदि होतो । 

( iv ) फर्म की सम्पत्तियों एवं दायित्वों के पुनर्मूल्यांकन के लाभ में हिस्सा । 

( v ) फर्म की ख्याति में हिस्सा । 

( vi ) फर्म के विगत चिठे से मृत्यु की तिथि तक के फर्म के लाभ में उसका हिस्सा । 

( vii ) संयुक्त जीवन बीमा पॉलिसी में उसका हिस्सा । 

निम्नांकित राशियाँ मृतक साझेदार के पूँजी खाते में डेबिट की जाती हैं तथा पूँजी खाते का शेष धन ही उसके उत्तराधिकारी को अदा किया जाता है -

 ( i ) मृतक साझेदार के पूँजी खाते , चालू खाते का डेबिट शेष ।

 ( ii ) मृत्यु तिथि तक उसके द्वारा आहरित की गई राशियाँ व उन पर ब्याज की राशि । 

( iii ) फर्म की अविभाजित हानि में उसका हिस्सा । 

( iv ) पुनर्मूल्यांकन की हानि का हिस्सा । 

( v ) विगत चिठे से मृत्यु की तिथि तक की हानि में उसका हिस्सा । 

मृत साझेदार के उपर्युक्तानुसार समायोजन करने के बाद , उसके पूँजी खाते के शेष को मृत साझेदार के उत्तराधिकारी के ऋण खाते में स्थानान्तरित कर दिया जाता है बशर्ते कि उसका नकद भुगतान न किया जा रहा हो । सामान्यतया साझेदारी संलेख में इस बात का स्पष्ट उल्लेख रहता है कि मृत साझेदार के दावे का भुगतान किस तरह किया जाना है । भारतीय साझेदारी अधिनियम की धारा 37 के अनुसार मृत साझेदार का उत्तराधिकारी देय राशि के भुगतान न किए गए भाग पर 6 % प्रतिवर्ष की दर से ब्याज प्राप्त करने का अधिकारी है अथवा उसे यह भी विकल्प प्राप्त है कि वह दावे की अप्राप्त राशि का फर्म की कुल पूँजी के अनुपात में फर्म के भावी लाभों में हिस्सा प्राप्त कर सकता है जब तक कि उसे पूर्ण भुगतान प्राप्त न हो जाये ।

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